कविता (क्या कसूर था मेरा ) // poor kids life
कविता (क्या कसूर था मेरा ) चोर तो नाम होता हैं उनका ,पर जिस्म से ज्यादा दिल पर चोट लगती है। ........ मै खडा इस उम्मीद में अकेले इस भीड़ में मदद कुछ मिल जाये ! दो निवाला न सही प्यास ही बुझ जाये जान जाने से पहले !! क्या कसूर था मेरा जो तूने दी इतनी बड़ी सजा ! देना ही था तो मौत देते इस मतलबी दुनिया में भेजने से पहले !! मुझे क्या पता था बरसात क्या होती होती है ! भीगा था उसी दिन रत भर उसे आसुओ में देखने के बाद !! दर्द ये पेट की तलब क्या होती हैं ! जाना था उसी दिन भूख से तड़पने के बाद !! सुबह का इंतजार उम्मीद जगा देती है ! रात्रि की पुकार एक घाव बना देती हैं !! तिरस्कार , अपमान ,तड़प ,झड़प हमारी जिंदगी के अहम् पहलू है साहब ! सब भूल गया रोटी के दो टुकड़े पाने के बाद !! दोस्त हमारे भी होते है पर ...